सुकमा , फरवरी। 24 -- छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले की दुर्गम पहाड़ियों में बसा गोगुंडा गांव आज न सिर्फ रोशनी से जगमगा उठा, बल्कि यह विकास की उस मशाल की जीत भी है, जिसने चार दशकों से लाल आतंक के अंधेरे में डूबे इस इलाके को नई सुबह दिखाई है। समुद्र तल से करीब 650 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस गांव में आजादी के 78 साल बाद पहली बार बिजली के बल्ब की रोशनी पहुंची है।
जिला पीआरओ से आज मिली जानकारी के अनुसार,यह ऐतिहासिक उपलब्धि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली सरकार की प्रतिबद्धता का परिणाम है। कल तक जहां सूर्यास्त के साथ ही घने जंगलों और नक्सली हिंसा की आशंका के चलते सन्नाटा पसर जाता था, वहां अब बच्चे रोशनी में पढ़ सकेंगे और ग्रामीण विकास की मुख्यधारा से जुड़ सकेंगे। गोगुंडा में ढिबरी (मिट्टी के तेल के दीपक) और टॉर्च की रोशनी में गुजरने वाली सदियों पुरानी परंपरा आज खत्म हो गई।
कलेक्टर अमित कुमार ने इसे सामाजिक और आर्थिक बदलाव की शुरुआत बताया। उन्होंने कहा कि जिले के अंतिम छोर तक बिजली, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा पहुंचाने का लक्ष्य है। गोगुंडा में बिजली पहुंचना यह साबित करता है कि सुरक्षा और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने बताया कि प्रशासन ने सुरक्षा बलों के सहयोग से इस दुर्गम क्षेत्र में बिजली पहुंचाने के लिए कई चुनौतियों का सामना किया। अब गोगुंडा सुरक्षित है और यहां जल्द ही सड़क, पुल और अन्य बुनियादी ढांचों का जाल बिछेगा।
गोगुंडा तक बिजली पहुंचाना अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी। यह इलाका लंबे समय से नक्सलियों का गढ़ और सुरक्षित ठिकाना रहा है। जहां पहले पहुंचने के लिए पांच घंटे की कठिन पैदल चढ़ाई करनी पड़ती थी, वहां अब विकास की गाड़ियां पहुंच रही हैं। सीआरपीएफ की 74वीं बटालियन, जिला प्रशासन और पुलिस ने मिलकर इस मुहिम को अंजाम दिया।
कमांडेंट 74वीं बटालियन हिमांशु पांडे ने बताया कि नक्सली दंश के कारण यह गांव दशकों पीछे चला गया था। यहां सुरक्षा कैंप की स्थापना के बाद से ही क्षेत्र में शांति स्थापित करने के प्रयास तेज थे। उन्होंने कहा कि सुरक्षा बलों ने न सिर्फ इस इलाके को नक्सल मुक्त बनाया, बल्कि विकास कार्यों में भी पूरा सहयोग दिया। अब मिली यह बिजली यहां शांति और प्रगति का नया अध्याय लिखेगी।
गांव के बुजुर्ग माड़वी सुक्का की आंखों में खुशी के आंसू थे। उन्होंने कहा कि कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जीते-जी गांव में बिजली देख पाएंगे। आज पहली बार लगा कि हम भी देश के नक्शे में हैं। उन्होंने कहा कि नक्सलियों के डर के कारण गांव हमेशा से अंधेरे में रहा, लेकिन अब ऐसा लग रहा है मानो कोई बोझ उतर गया हो। एक अन्य ग्रामीण ने बताया कि अब बच्चे पढ़ सकेंगे और घरों में भी रोशनी होगी।
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