उन्नाव, अगस्त 22 -- Unnao News: हिलौली, संवाददाता। सावन का महीना आते ही कभी गांवों में कजरी और लोकगीतों की गूंज सुनाई देती थी। गांव की गलियों, चौपालों और बाग-बगीचों में झूले पड़ते थे। महिलाएं व युवतियां समूह बनाकर झूला झूलते हुए सावन के पारंपरिक गीत गाती थीं। अब बदलती जीवनशैली और आधुनिकता के प्रभाव में सावन की यह लोकपरंपरा धीरे-धीरे गांवों से दूर होती जा रही है। क्षेत्र के बुजुर्गों के मुताबिक, पहले सावन गांव की संस्कृति और आपसी मेलजोल का खास समय हुआ करता था। पुराने पेड़ों की मजबूत टहनियों पर झूले डाले जाते थे। महिलाएं समूह में कजरी और लोकगीत गाती थीं, जबकि बच्चे और युवतियां झूला झूलकर सावन का आनंद लेते थे। शाम होते ही घरों के आंगन और चौपालों पर गीतों की महफिल सजती थी। इसमें किसी औपचारिक निमंत्रण की जरूरत नहीं होती थी और गांव की महिलाएं व...