सुपौल, अगस्त 23 -- Supaul News: त्रिवेणीगंज, मनोज रोशन। कभी सावन का महीना शुरू होते ही गांवों की गलियों से लेकर बगीचों तक रौनक छा जाती थी। आम, बरगद और कटहल की ऊंची डालियों पर झूले लग जाते थे। झूले पर बैठी युवतियों और महिलाओं की कजरी-मल्हार की तान पूरे गांव में गूंजती थी। नवविवाहित बेटियों के मायके लौटने के साथ सावन का उल्लास और बढ़ जाता था। लेकिन बदलते समय के साथ सावन की यह तस्वीर भी बदल गई है। अब न पेड़ों की डालियों पर पहले जैसे झूले दिखाई देते हैं और न ही कजरी-मल्हार की सामूहिक गूंज सुनाई देती है। मोबाइल और इंटरनेट की बढ़ती संस्कृति ने लोक परंपराओं को घरों की चारदीवारी तक सीमित कर दिया है।

परंपरा का बदलाव बुजुर्ग बताते हैं कि दो-तीन दशक पहले तक सावन आते ही गांवों में झूला लगाने की तैयारी शुरू हो जाती थी। बच्चे, किशोरियां और महिलाएं मिल...