संतकबीरनगर, अगस्त 6 -- Santkabir Nagar News: नंदौर, संतोष कुमार चतुर्वेदी। सावन का महीना आते ही कभी गांवों में हरियाली के बीच पेड़ों पर झूले पड़ जाते थे। सखियों की हंसी-ठिठोली, झूला झूलती युवतियां और फिजाओं में गूंजती कजरी की मधुर तान पूरे माहौल को उत्सवमय बना देती थी। लेकिन बदलते समय और आधुनिक जीवनशैली की दौड़ में अब सावन की यह पहचान धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। आज न पेड़ों पर झूले दिखाई देते हैं और न ही गलियों, चौपालों व खेत-खलिहानों में कजरी की गूंज सुनाई देती है। यह भी पढ़ें- सावन में कजरी की मिठास हुई फीकी, लोक परंपरा को बचाने की जरूरत झूलों और कजरी की परंपरा एक समय था जब गांव के आम, नीम और जामुन के पेड़ों पर रस्सियों के मजबूत झूले बांधे जाते थे। सावन भर बच्चे, किशोरियां और महिलाएं झूला झूलने पहुंचती थीं। झूले के साथ कजरी गायन की परंपर...