नई दिल्ली, अगस्त 22 -- जीवन में गलतियां होना आम बात है। कभी कोई गलत फैसला ले लिया जाता है, तो कभी शब्दों या व्यवहार से किसी को ठेस पहुंच जाती है। हालांकि, समय बीतने के बाद भी मन बार-बार उसी घटना पर अटक जाता है। काश वैसा ना किया होता, यह सोच मन को बोझिल कर देती है। श्रीमद्भगवद्गीता हमें सिखाती है कि अतीत की गलती में डूबे रहने की बजाय उससे सीखकर वर्तमान में सही कर्म करना ही असली रास्ता है।अपराधबोध होना स्वाभाविक है गलती होने के बाद मन में अपराधबोध उठना सामान्य बात है। यह भावना कई बार हमें अपनी गलती का अहसास कराती है। गीता में भी कर्म और उसके फल की बात बार-बार आती है। समस्या तब शुरू होती है, जब व्यक्ति गलती स्वीकार करने के बजाय खुद को लगातार सजा देने लगता है। अपराधबोध को चेतावनी की तरह लें, लेकिन उसे अपने पूरे अस्तित्व पर हावी ना होने दें। ग...