नई दिल्ली, जुलाई 17 -- देशभर में रोजाना लगभग 40 लाख कमर्शियल सिलेंडरों का इस्तेमाल होता है। इनमें से अधिकांश पारंपरिक वाष्प आधारित सिलेंडर (Vapour Of Take) हैं। इन सिलेंडरों की सबसे बड़ी समस्या प्रॉब्लम यह है कि पूरी गैस का इस्तेमाल हो ही नहीं पाता। कुछ न कुछ गैस रह जाती है और लगता है कि सिलेंडर में गैस खत्म हो गई। इसे ऐसे समझें, प्रत्येक 19 किलोग्राम वाले पारंपरिक सिलेंडर में लगभग 1 किलोग्राम गैस रह जाती है, जो बर्बाद हो जाती है। यानी रोजाना करीब 4,000 टन एलपीजी का नुकसान हो जाता है। यह सालाना 1.46 मिलियन टन के बराबर है।अब क्या बदल गया है भारत की ऑयल मार्केटिंग कंपनियां अब कमर्शियल और इंडस्ट्रियल यूजर्स को तरल एलपीजी सिलेंडरों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करने में जुटी हैं। यह कदम देश में ईंधन की बर्बादी को कम करने और दक्षता बढ़ाने क...