गंगापार, अगस्त 1 -- Gangapar News: सावन की रिमझिम फुहारें आज भी धरती को भिगो रही हैं, लेकिन गांवों में कभी इस मौसम की पहचान रहे कजरी गीत और पेड़ों पर पड़ने वाले झूले अब विरले ही दिखाई देते हैं। समय के साथ बदलती जीवनशैली और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने सावन के पारंपरिक उत्सवों की रौनक काफी हद तक कम कर दी है। जो कजरी कभी गांवों की चौपालों, बाग-बगियाओं और खेत-खलिहानों में देर रात तक गूंजती थी, वह अब मोबाइल की रील्स और मंचीय प्रस्तुतियों तक सिमटती जा रही है। यह भी पढ़ें- Bhagalpur News: सावन में झूले का बदलता रंग: बगीचों से बालकनी तक सिमटी परंपरालोक गीतों की कमी बरसात के दिनों में धान की रोपाई के दौरान खेतों में महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले रोपनी गीत भी अब सुनाई नहीं पड़ते। ग्रामीणों का कहना है कि पहले सावन आते ही गांवों में झूले पड़ते थे औ...