देहरादून, अक्टूबर 24 -- Dehradun News: देहरादून। प्रमुख संवाददाता हिमालयी वस्त्र केवल पहनावा नहीं, बल्कि पहाड़ की जलवायु, संस्कृति और पीढ़ियों के अनुभव का प्रतीक हैं। ऊन और पश्मीना की गर्माहट से लेकर भांग और बिच्छू घास के मजबूत रेशों तक, पारंपरिक वस्त्रों में ऊंचाई वाले क्षेत्रों की कठिन परिस्थितियों से निपटने का हुनर छिपा है। यह बात ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी में आयोजित संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने कही।शनिवार को हिमालयी वस्त्र परंपरा, तकनीक और टिकाऊ भविष्य विषय पर आयोजित संगोष्ठी के समापन सत्र में सहायक निदेशक (हस्तशिल्प) गोपेश कुमार मौर्य ने कहा कि उत्तराखंड की हस्तशिल्प परंपरा राज्य की सांस्कृतिक पहचान के साथ आजीविका का भी महत्वपूर्ण आधार है। पारंपरिक रेशों, बुनाई और रंगों की विविधता को संरक्षित कर इन्हें टिकाऊ भविष्य से जोड़ा जा सकता ह...