अररिया, अक्टूबर 29 -- Araria News: पवन कुमार सिंह, रानीगंज। आधुनिकता की दौड़ में ग्रामीण संस्कृति और परंपराओं की पहचान रहे मेलों की रौनक धीरे-धीरे गायब होती जा रही है। कभी दशहरे से लेकर छठ पूजा तक गांव-गांव में लगने वाले मेलों में लोगों की भारी भीड़ जुटती थी। हाथी-घोड़ों के साथ महीनों तक चलने वाले इन मेलों में खरीदारी, मनोरंजन और आपसी मेल-मिलाप का अलग ही उत्साह रहता था। लेकिन बदलते समय के साथ मेलों का स्वरूप सिमटता जा रहा है। कालाबलुवा, गुणवंती, बसेटी, फरकिया समेत कई स्थानों पर लगने वाले पुराने मेलों का अस्तित्व अब समाप्त हो चुका है। रानीगंज का प्रसिद्ध दोस्ती मेला, कृष्णअष्टमी मेला, मधु मेला, बसेती का मंठ मेला, नगराही का अंनत मेला, ठेकपुरा का जितिया मेला आदि का अब नामोनिशान मिटने लगा है। दो दशक पहले तक ग्रामीण क्षेत्रों में मेला केवल मनोरंज...