80वें बरस को जो सोचना है
नई दिल्ली, अगस्त 15 -- स्वतंत्रता दिवस समारोह की खुमारी के बाद हमें कुछ जटिल मुद्दों पर विचार के लिए खुद को तैयार करना चाहिए। क्या हैं ये मुद्दे? मैं आपको 1960 के दशक के उत्तर प्रदेश में ले चलना चाहता हूं। उसी की शुरुआत में मेरा वाराणसी में जन्म हुआ था। उसी दशक में मेरी पीढ़ी को चेतना हासिल होनी आरंभ हुई थी। हमारा लोकतंत्र भी दो आम चुनावों के बाद अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने लगा था। तमाम युगांतरकारी काम उसी दशक में हुए। तब से अब तक का यह सफरनामा किसी व्यक्ति विशेष या पीढ़ी का नहीं, बल्कि समूचे मुल्क का है। उन दिनों के आईने में आज को देखना, खुद को आंकने के बराबर है। शैशवकाल में देखी गंगा का चौड़ा पाट और उसमें तिरती नावें मुझे आज भी नहीं भूलतीं। उस दौरान शहर में घंटों बिजली नहीं रहती और गांवों में तो अधिकांश घर 'बत्तीविहीन' थे। उन्हीं दिनों ...
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