अलीगढ़, जून 12 -- अलीगढ़, वरिष्ठ संवाददाता। दूध जैसी सफेद त्वचा, हल्के बाल और धूप में आंखें न खोल पाने की समस्या को आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग दैवीय प्रकोप, जादू-टोना या किसी रहस्य से जोड़कर देखता है। जबकि, चिकित्सा विज्ञान इस धारणा को पूरी तरह खारिज करता है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐल्बिनिजम या रंगहीनता कोई अभिशाप नहीं, बल्कि आनुवंशिक बदलाव का परिणाम है। यह स्थिति तब विकसित होती है जब माता-पिता दोनों से दोषपूर्ण जीन बच्चे तक पहुंचते हैं और शरीर में मेलेनिन बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है। अलीगढ़ और आसपास के जिलों से हर वर्ष रंगहीनता के दर्जनों मरीज जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज व निजी अस्पतालों की ओपीडी में पहुंचते हैं। चिकित्सकों के अनुसार अधिकांश मामलों में त्वचा, बाल और आंखें तीनों प्रभावित होती हैं। यह बीमारी किसी संक्रमण, खानपान या...