'बाबू, हम तो बहरूपिया हैं, पुरखों की कला बचाकर किसी तरह चला रहे परिवार'
पूर्णिया, मई 31 -- कसबा, एक संवाददाता। रंग-बिरंगे परिधान, चेहरे पर आकर्षक मेकअप और हर दिन नया किरदार। कभी रावण, कभी हनुमान, कभी कंस तो कभी चंद्रकांता कथा के क्रूर सिंह बनकर लोगों का मनोरंजन करने वाले बहरूपिया कलाकारों की जिंदगी मंच से उतरते ही संघर्ष और अभावों से घिर जाती है। दूसरों के चेहरे पर मुस्कान बिखेरने वाले ये कलाकार आज अपनी पारंपरिक कला को बचाने और दो जून की रोटी जुटाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। पूर्णिया जिले के कसबा, गढ़बनैली समेत विभिन्न बाजारों में इन दिनों बहरूपिया कलाकारों को अलग-अलग रूप धारण कर अपनी कला का प्रदर्शन करते देखा जा सकता है। लोगों की भीड़ जुटती है, बच्चे उत्साहित होते हैं और कुछ देर के लिए बाजार का माहौल मनोरंजन से भर जाता है। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे कलाकारों की पीड़ा और संघर्ष की लंबी कहानी छिपी है। बहरूपिए ...
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