'निर्गुण स्वर' ने कराए क्रांतिकारी कबीर के दर्शन
वाराणसी, जुलाई 3 -- वाराणसी। संत कबीर सिर्फ एक संत नहीं थे। वह अपने युग के महान क्रांतिकारी थे। युग परिवर्तन के लिए ही उन्होंने सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों का मुखर विरोध किया था। धर्म के नाम पर होने वाले पाखंड, जात-पांत, छुआछूत और अंधविश्वासों का पुरजोर विरोध उन्हें संत के साथ साथ क्रांतिकारी के रूप में भी प्रतिष्ठित करता है। संत कबीर का यह स्वरूप गुरुवार को 'निर्गुण स्वर' के मंचन में प्रत्यक्ष हुआ। यह नाटक सुबह-ए-बनारस आनंद कानन की ओर से आयोजित ग्रीष्मकालीन कार्यशाला में तैयार किया गया है। 'निर्गुण स्वर' नाटक कालजयी साहित्यकार भीष्म साहनी की कृति 'कबीरा खड़ा बाजार में' पर आधारित रहा। नगर के वरिष्ठ रंगधर्मी नवीन चंद्रा के निर्देशन में इस नाटक का मंचन अस्सी घाट पर किया गया। आडंबर और पाखंड का खंडन कर सामाजिक समरसता का मंडन करने वाले युगदृष्...
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