गिरडीह, सितम्बर 24 -- पीरटांड़, प्रतिनिधि। धन-संपत्ति और संबंधों के बीच रहते हुए भी मन में मेरा का भाव न होना ही उत्तम आकिंचन्य धर्म की साधना है। धन जेब, घर, व्यापार या बैंक खाते में रहे, लेकिन मन में न बसे व धन के प्रति आसक्ति समाप्त होती है तो वह बंधन नहीं, बल्कि सेवा और सदुपयोग का साधन बन जाता है। इसी तरह संबंधों में अधिकार के स्थान पर प्रेम और स्वतंत्रता का भाव विकसित होता है। उक्त बातें मधुबन में साधनारत राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कही। बतला दें कि दशलक्षण महापर्व के अवसर पर मधुबन स्थित गुणायतन में आयोजित श्रावक संस्कार शिविर में श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, संयम, त्याग, अपेक्षामुक्त संबंध और आत्मचेतना की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी जा रही है। यह भी पढ़ें- शिविरार्थियों को साधना संग सिखाए जा रहे संस्कार धर्मसभा में म...