बुलंदशहर, मार्च 3 -- फाल्गुन मास की मस्ती और रंगों की बौछार का प्रतीक होली का त्योहार समय के साथ अपने स्वरूप में बदलाव देख रहा है। जहां एक ओर पुराने समय की होली सादगी, आत्मीयता और परंपराओं से सराबोर होती थी, वहीं आज की होली में आधुनिकता, तकनीक और बदलती जीवनशैली की छाप साफ दिखाई देती है। बीते दौर में होली का उत्सव कई दिनों पहले से शुरू हो जाता था। गांव-गांव में होलिका दहन की तैयारियां सामूहिक रूप से होती थीं। बच्चे टोलियां बनाकर लकड़ियां इकट्ठा करते थे और महिलाएं घरों में गुजिया, मठरी, दही बड़े जैसे पारंपरिक पकवान बनाती थीं। प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता था-टेसू के फूलों से बना केसरिया रंग, हल्दी और चंदन का लेप। ढोलक और मंजीरे की थाप पर फाग गाए जाते थे। लोग घर-घर जाकर अबीर-गुलाल लगाते और गले मिलकर बधाई देते थे। आपसी मनमुटाव भूलकर रिश्तों म...
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