नई दिल्ली, मार्च 3 -- होली तमाम तरह के बैर भावों को भुलाकर परस्पर मिलने-जुलने का त्योहार है। संदेह नहीं कि होली की प्रासंगिकता समय के साथ बढ़ती जा रही है, क्योंकि हम अपने चारों ओर वैर भाव को बढ़ते देख रहे हैं। हम यह भी महसूस कर रहे हैं कि परस्पर मिलना-जुलना घट रहा है। साल 2026 की यह होली तो और भी खास है, जब दुनिया के एक बड़े हिस्से में युद्ध चल रहा है। संयोग है, यह पाक रमजान का भी समय है, लेकिन सोचकर देखिए, आज रमजान की कितनी कद्र हो रही है? अफसोस, आज रमजान की उतनी ही कद्र रह बची है, जितनी होली की। इंसानी समाज अपने बुनियादी त्योहारों, व्रतों के मूल्यों को अपने जीवन में उतना नहीं उतार पा रहे हैं, जितना उतारने की जरूरत है। दुनिया के संदर्भ में यह चिंता की बात है कि अनेक देशों और समाजों में इंसानियत की चिंता समय के साथ घटती चली जा रही है। आज ...
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