गंगापार, मार्च 3 -- मांडा, हिन्दुस्तान संवाद। आपसी प्रेम, सौहार्द्र, भाईचारा, उल्लास एवं रंगरास की प्रतीक होली पर्व का स्वरूप धीरे धीरे बदल रहा है। जहां कभी पखवाड़े भर पहले गांवों की चौपालों में फागुनी गीतों की गूंज घर-आंगन, खेत-सीवानों को अनुरंजित करती थी, वह भी अब सिमटती जा रही है। फागुनी गीतों का लोकरंग सहेजना बहुत जरूरी है, जिससे अपनी परंपरा और लोक संस्कृति के प्रतीक इस उल्लास पर्व की पहचान कायम रह सके। अपनी माटी व परिपाटी के गीतों के बदलते लोकरंग विषय पर शोधकार्य में लगे चर्चित हास्य कवि अशोक बेशरम ने होली के बदलते स्वरूप पर मांडा खास में सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य ओंकारेश्वर प्रसाद द्विवेदी के आवास पर हुई एक बैठक में चिंता जाहिर करते हुए उक्त विचार व्यक्त किया। कहा कि कभी आधे माघ से चैत मास तक होली का रंग जमता था, तो फागुन लगते ही फगु...
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