हिमालय दिवस पर उठे सवाल: उत्तराखंड में ही क्यों न बने पृथक विकास का मॉडल
देहरादून, सितम्बर 8 -- देहरादून। पर्यावरणविद एवं सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश भाई ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण बीते तीन दशकों में हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की दर दोगुनी हो चुकी है। इसका सीधा असर नदियों, जल स्रोतों और पर्वतीय पारिस्थितिकी पर पड़ रहा है, जिससे हिमालय क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं का केंद्र बनता जा रहा है। भारतीय हिमालय की सीमाओं पर स्थित लगभग 8 हजार ग्लेशियर झीलों में बढ़ते पानी के आयतन से निचले क्षेत्रों में बाढ़ और भूस्खलन का गंभीर खतरा मंडरा रहा है। 'नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी, रुड़की' ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में दाखिल अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि बढ़ता तापमान, मौसम का बदलता चक्र, बढ़ती मानवीय गतिविधियां और अनियोजित विकास हिमालय के लिए बड़ी चुनौती हैं। संस्थान ने इस स्थिति से निपटने के लिए एक पृथक और...
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