कटिहार, मार्च 1 -- कटिहार, हिन्दुस्तान प्रतिनिधि कटिहार जिले के गांवों में कभी होली का मतलब सिर्फ रंग-गुलाल नहीं, बल्कि परंपरा, सामूहिकता और लोकगीतों की जीवंत विरासत हुआ करती थी। शिवरात्रि के साथ ही फगुआ की शुरुआत हो जाती थी। ढोल, झाल और मजीरा की थाप पर जोगीरा सा रा रा की गूंज दूर तक सुनाई देती थी। बल्थी महेशपुर के 75 वर्षीय बसंत मुनि, बसुहार के राम नारायण मंडल ने बताया कि 10 साल पहले तक हमलोग 'जानी नांच' की टोली गांव-गांव घूमकर फगुआ गीत गाते थे और हर घर में उत्सव का माहौल बना देती थी। इतना ही नहीं विगत एक दशक से जानी नांच नहीं होने के कारण ढोलक व झाल की आवाज पर सदा आनंद रहे येही द्वारे मोहन खेले होरी हो के गीत अब सिर्फ मोबाइल पर ही सुनने को मिलता है। नई पीढ़ी लोकगीतों की जगह डीजे और फिल्मी गानों को दे रही है प्राथमिकता युवाओं की नई पीढ़ी ल...