नई दिल्ली, दिसम्बर 22 -- हिंदू धर्म में संन्यास जीवन का चौथा आश्रम है, जहां व्यक्ति गृहस्थ जीवन त्यागकर पूरी तरह भगवान की भक्ति और मोक्ष की साधना में लग जाता है। संन्यास लेने से पहले आत्म-श्राद्ध या स्वयं का अंतिम संस्कार करने की परंपरा है। यह एक प्रतीकात्मक अनुष्ठान है, जिसमें साधक अपने पुराने जीवन का 'मृत्यु' संस्कार करता है। शास्त्रों में इसे विरजा होम या प्रैष श्राद्ध कहा जाता है। इसका उद्देश्य पुराने संसारिक बंधनों से मुक्ति और नई आध्यात्मिक जिंदगी की शुरुआत है। यह परंपरा उपनिषदों और स्मृतियों में वर्णित है। आइए जानते हैं इसके महत्व को।संसारिक बंधनों से मुक्ति का प्रतीक संन्यास लेने वाला व्यक्ति गृहस्थ जीवन के सभी बंधनों - परिवार, संपत्ति, नाम-यश को त्याग देता है। आत्म-श्राद्ध में वह प्रतीकात्मक रूप से अपने पुराने जीवन का अंतिम संस्क...
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