नई दिल्ली, अप्रैल 18 -- सुधीश पचौरी,हिंदी साहित्यकार एक ने हिंदी के कई साहित्यकारों को सांप्रदायिक कह दिया, तो हंगामा हो गया। आजू-बाजू खड़े हिंदी के सोशल साहित्यिक 'सूरमा' अपने-अपने हरबे-हथियार लेकर कूद पड़े। जल्दी ही थर्ड पार्टी मैदान में, फिर तो चौथी, पांचवीं, छठी, सातवीं से लेकर पचासवीं पार्टी तक आ जुटीं। सोशल मीडिया के विवादजीवी मंचों में हिंदी के अधिकांश लेखक या तो पहली पार्टी हैं या दूसरी, तीसरी से लेकर सौवीं पार्टी तक हैं। जितनी पार्टी, उतने विचार, उतनी आलोचना, उतनी प्रत्यालोचना, सहमतियां-असहमतियां। देखते-देखते हिंदी जगत दो- तीन-चालीस-पचास फाड़ हो जाता है। किसी की कोई लाइन, कोई कमेंट, विचार, कटाक्ष हिंदी साहित्य के एक मुखर हिस्से को एक-दो दिन के लिए बिजी कर देता है। चर्चा में आने के लिए कोई किसी दिन किसी को छेड़ देता है और तुरंत अख...
Click here to read full article from source
इस लेख के रीप्रिंट को खरीदने या इस प्रकाशन का पूरा फ़ीड प्राप्त करने के लिए, कृपया
हमे संपर्क करें.