नई दिल्ली, अप्रैल 11 -- सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार किसी को तीन पुस्तकों पर तीन सम्मान मिल चुके हैं। किसी को चार पुस्तकों पर चार। किसी-किसी को तो एक ही किताब पर दो-दो पुरस्कार मिल चुके हैं और किसी को एक ही रचना पर तीन सम्मान। इन दिनों जितने लेखक हैं, उनसे ज्यादा सम्मान हैं। हिंदी में जितनी प्रतिभा इन दिनों बरस रही है, उतनी पिछले सौ साल में न बरसी थी। मैं इन नए लेखकों की प्रतिभा पर मुग्ध हूं। जब 'ओपिनिंग' में ही इतने छक्के-चौके लगाए हैं, तो आगे कितने न लगाएंगे? सच! नए लेखकों की उपलब्धियां पुराने रचनाकारों को लजाने वाली हैं। पहले लेखक जिंदगी भर घिसते रहते, कोई पूछने वाला न होता। जब सम्मान न थे, तब रचना थी। जब तक कम थे, तब तक भी रचना की 'क्वालिटी' थी। लेखक क्वालिटी पर ध्यान देते थे, पर जैसे ही सम्मान बढ़े, क्वालिटी का कबाड़ा हो गया। इतिहास...