वाराणसी, अगस्त 14 -- प्रयागराज, विधि संवाददाता। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी भूमि को राजस्व अभिलेखों में बाद में 'तालाब' दर्ज कर देना व्यक्ति की वैध किरायेदारी या कब्जे के अधिकार को समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम की धारा 212 के तहत बेदखली के लिए यह साबित करना जरूरी है कि संबंधित व्यक्ति को सार्वजनिक उपयोग के तालाब अथवा अधिनियम में वर्णित अन्य भूमि पर ही पट्टेदार के रूप में स्वीकार किया गया था। न्यायमूर्ति अरुण कुमार ने यह आदेश अछैबर सिंह बनाम बोर्ड ऑफ रेवेन्यू एवं अन्य मामले में पारित किया। न्यायालय ने बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के एक अक्तूबर 1980 के आदेश को रद्द करते हुए अतिरिक्त आयुक्त वाराणसी के 4 जनवरी 1971 के आदेश को बहाल कर दिया।

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