नई दिल्ली, अप्रैल 12 -- आलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकार अमेरिका-ईरान की वार्ता के बेनतीजा निकलने से एक बार फिर दुनिया उसी मुहाने पर आ खड़ी हुई, जहां वह 8 अप्रैल से पहले थी। इन दोनों में से एक ने भी अस्थायी युद्ध-विराम का पालन नहीं किया, तो आग फिर से भड़क सकती है। नतीजा क्या होगा इसका, नमूना पूरी दुनिया देख चुकी है। मुमकिन है कि दोनों ही पक्ष युद्ध-विराम की शर्तों को अपने पक्ष में करवाने के लिए दबाव बनाते रहें, लेकिन युद्ध की तरफ शायद तय अवधि तक न लौटें। हालांकि, इस परिस्थिति में भी दुनिया को इस युद्ध की कीमत लंबे समय तक चुकानी पड़ेगी और जब कीमत चुकाने का सवाल उठता है, तो फिर सबको अपना-अपना हिसाब भी लगाना होगा। भारत के लिए यह बहुत ही बड़ा सवाल है। होर्मुज जलमार्ग के बंद होने के कारण तेल-गैस की महंगाई का असर तो जगजाहिर है, पर पश्चिम एशिया के देशो...
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