नई दिल्ली, मार्च 3 -- पं. हरिप्रसाद चौरसिया, प्रसिद्ध बांसुरी वादक होली! नाम सुनते ही मन में उमंग की तरंग दौड़ जाती है। इसके जैसा त्योहार पूरी पृथ्वी पर नहीं मिलता। मान्यता है कि इसमें पार्वती और शिव का मिलन होता है। ऐसा आनंद मैंने किसी त्योहार में नहीं देखा। मैं बड़ा नसीब वाला हूं कि मेरा जन्म इलाहाबाद में हुआ। इलाहाबाद जैसी होली कहीं नहीं होती। बचपन में जब हम इलाहाबाद में रहते थे, तब होली में चंदा इकट्ठा करते थे। बड़े-बड़े व्यवसायियों के पास जाते थे। उनमें से कोई चंदा देता, कोई नहीं देता था। किसी का मूड अगर ठीक रहा, तो वह एक रुपया दे दिया, कोई गुस्से में हुआ, तो आठ आने देकर ही टरका देता। फिर भी अच्छे-खासे पैसे जमा हो जाते थे। दरअसल, ये पैसे हम होलिका दहन की लकड़ी खरीदने के लिए इकट्ठा करते थे। रात में 12 बजे होलिका दहन करते थे, फिर उस सम...