नई दिल्ली, जुलाई 15 -- सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में करीब 49 साल पहले हुई हत्या के एक मामले में ‌सत्र अदालत और हाईकोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए पांच लोगों को बरी कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि न्यायिक मजिस्ट्रेट को एफआईआर भेजने में देरी अहम हो जाती है और अगर इसे समय से पहले दर्ज करने, पिछली तारीख डालने और मनगढ़ंत कहानी बनाने और रिकॉर्ड के निर्माण के आरोपों के साथ जोड़ा जाता है तो संदेह पैदा होता है। इस मामले के दो आरोपियों की पहले ही मौत हो चुकी है। जस्टिस विक्रम नाथ और ‌संदीप मेहता की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दाखिल अपील स्वीकार करते हुए यह फैसला दिया। पीठ ने 64 पन्नों के फैसले में कहा कि जांच में गंभीर विसंगतियों, बिना वजह के देरी और एफआईआर की असलियत पर संदेह के कारण अभियोजन पक्ष बिना किसी शक के उनका अपराध साबित करने में नाकाम ...