हजारों बेसहारा बहनों का वह आखिरी सहारा
नई दिल्ली, मई 30 -- इस दुनिया में जितनी बेबसी है, उससे कई गुना ज्यादा उम्मीदें हैं। जाहिर है, त्रासदियों और चमत्कारों से भरे इस मानव-महासागर की कुछ ही जिंदगियों को हम पढ़ और सुन सकते हैं। इसीलिए हम उन्हीं किरदारों को चुनते हैं, जो मानवता की अनुकरणीय मिसालें पेश करते हैं; जिनकी नेकदिली से हमारा समाज, देश और इंसानियत जगमग है। एक ऐसे ही शख्स हैं- देवेंद्र कुमार। आज से 36 साल पहले की बात है। देवेंद्र तब दो साल के थे, उनकी छोटी बहन तो महज तीन दिन की थी। दिल्ली की एक मलिन बस्ती में रह रही उनकी बूढ़ी दादी के दरवाजे पर देवेंद्र को छोड़कर माता-पिता लापता हो गए थे। दो साल के भाई की गोद में तीन दिन की बहन! इससे बड़ी जिम्मेदारी शायद ही किसी भाई को कभी मिली होगी। दादी और कुंवारी बुआ ने खून के रिश्ते की लाज बचा ली। चार साल की उम्र में देवेंद्र जब कुछ ह...
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