हज़रत हुसैन का आखिरी सजदा कर्बला में
फतेहपुर, जून 25 -- जहानाबाद। मोहर्रम की दस तारीख़ जिसको यौमे आशूरा के नाम से जाना जाता है, का वह दिन था जब ख़्यामे हुसैनी में पानी की एक बूंद न थी। छोटे-छोटे बच्चे अल अतश, अल अतश, की सदाएं लगा रहे थे। हज़रत हुसैन कभी हुर का लाशा लाते तो कभी क़ासिम के जिस्म के टुकड़ों को बटोर कर लाते तो कभी अली अकबर के सीने से बरछी निकालते। उपरोक्त जानकारी देते हुए ग्राम मिर्जापुर में एक मजलिस को ख़िताब करते हुए मौलाना सैय्यद अम्मार काज़मी ने बताया कि हजरत हुसैन आशूरा के दिन सुबह से लाशे लाते लाते थक गए। नमाजे अर्स का वक्त आ गया, मैदाने कारज़ार में हुसैन तन्हा जंग करने पहुंचे और यादगार जंग की। यह भी पढ़ें- चरौरा-औरंगाबाद में जुलूस निकाले जैसे ही हज़रत हुसैन के कानों में अज़ान की आवाज़ सुनाई दी आपने तलवार को म्यान में रख लिया। तभी एक आवाज़ आई हुसैन बस इम्तिहा...
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