स्मृति शेष: बशीर बद्र की शायरी व गजलों पर जब झरिया में बजी थीं तालियां
धनबाद, मई 29 -- दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों... कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगी, यूं कोई बेवफा नहीं होता... लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में...। इन पंक्तियों को लिखने वाले मशहूर शायर व पद्यश्री पुरस्कार से सम्मानित बशीर बद्र का गुरुवार को निधन हो गया। बशीर बद्र के निधन के बाद उर्दू साहित्य से जुड़ाव रखने वाले धनबाद-झरिया के पुराने लोगों ने उन्हें याद किया। मशहूर शायर बशीर बद्र दो बार धनबाद के झरिया आ चुके हैं। बोर्ड उर्दू मध्य विद्यालय झरिया के वरीय शिक्षक शरीफ रजा कहते हैं कि उन्हें झरिया से लगाव था। जब भी मौका मिला, वे झरिया आए। 1980 के दशक में वे पहली बार उर्दू लाइब्रेरी झरिया के बैनर ते झरिया चिल्ड्रन पार्क में आयोजित मुशायरा सम्मेलन में हिस्सा लेने...
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