नई दिल्ली, सितम्बर 24 -- एक अहम फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि सत्र अदालत किसी आरोपी को हत्या का दोषी ठहराते समय यह आदेश नहीं दे सकता कि दोषी अपनी बची हुई पूरी जिंदगी जेल में ही बिताएगा। यह फैसला एक पेचीदा कानूनी सवाल पर था कि क्या ट्रायल कोर्ट, आईपीसी की धारा-302 के तहत हत्या के मामले में दोषी को उम्रकैद की सजा सुनाते समय यह कह सकता है कि दोषी अपनी बची हुई जिंदगी जेल में बिताएगा और उसे सजा में छूट या सजा कम करने का कानूनी फायदा नहीं मिलेगा। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने पिछले फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि हालांकि उम्रकैद का मतलब दोषी की बची हुई ज़िंदगी भर की जेल होती है, लेकिन सजा में छूट और सजा कम करने की कानूनी शक्तियों को सत्र अदालत कम नहीं कर सकती। यह भी पढ़ें- बेटी के यौन शोषण के दोषी की स...