नई दिल्ली, जनवरी 9 -- सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि अदालतों को असंवेदनशील नहीं होना चाहिए। इसी टिप्पणी के साथ शीर्ष अदालत ने 1992 के एक आपराधिक मामले में दोषी ठहराए गए 80 वर्षीय व्यक्ति की सजा में संशोधन करते हुए उसे पहले ही जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया। हालांकि, न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति एनवी अंजरिया की पीठ ने उस व्यक्ति की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, जिसने इस मामले में कुल छह साल तीन महीने की अवधि जेल में काटी है। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 304 भाग-दो के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल की जेल की सजा सुनाई थी। शीर्ष अदालत ने कहा, ''इस समय अपीलकर्ता की आयु 80 वर्ष से अधिक है। चूंकि, अपीलकर्ता वृद्ध व्यक्ति है और अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर है, इसलिए इस अवस्था में उसे द...
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