कानपुर, मार्च 12 -- कानपुर। बर्रा विश्व बैंक सेक्टर एक में चल रही श्रीमद्भागवत के समापन दिवस पर गुरुवार को आचार्य पीयूष ने कहा कि सुदामा एक जितेंद्रिय पुरुष थे। जितेंद्रिय व्यक्ति कभी याचक नहीं हो सकता। याचक तो इंद्रियों का गुलाम होता है। सुदामा जीवन भर प्रभु के भजन में लीन रहकर उन्हीं की साधना करते रहे और कभी अपनी गरीबी के विषय में कोई शोक नहीं किया। गरीबी में भी प्रभु कृपा का अनुभव करते रहे। सुशीला के कहने पर वह द्वारका जाते तो हैं लेकिन वहां भी प्रभु दर्शन ही सबसे अभीष्ट थे। अपनी इच्छा नहीं बल्कि सुशीला की भी इच्छा को प्रभु के सामने व्यक्त नहीं कर पाए लेकिन अंतर्यामी प्रभु ने सुशीला की कामना को जानकर उसे पूर्ण कर दिया। प्रभु से प्राप्त संपत्ति को भी सुदामा ने अपने जीवन में भोग नहीं किया बल्कि समाज की सेवा में ही लगाया।
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