शामली, दिसम्बर 1 -- शहर के जैन धर्मशाला में सोमवार को आचार्य श्री 108 नयन सागर मुनिराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए जीवन की चार अवस्थाओं तथा आत्मिक उन्नति पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जीव अनादि काल से सुख-दुख के चक्र में भटकता रहा है। नरक गति में दुख की प्रधानता होती है, जबकि मनुष्य गति तुलनात्मक रूप से सुखद है, फिर भी मनुष्य पूरी तरह सुखी नहीं है। मनुष्य के पास आत्म-कल्याण का सर्वाेत्तम अवसर है, जबकि देवगति में केवल शारीरिक और क्षणिक सुख उपलब्ध होते हैं। उन्होंने कहा कि वास्तविक सुख इंद्रिय भोगों से परे है। शारीरिक सुखों में लिप्त व्यक्ति आत्मा की ओर नहीं बढ़ सकता। आत्मा की चर्चा अलग बात है, लेकिन उसका अनुभव करना श्रेष्ठ और दुर्लभ साधना है। प्राचीन काल में अनेक मुनिराज बिना शब्द-ज्ञान के भी आत्मसाक्षात्कार कर लेते थे, जबकि आज...
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