नई दिल्ली, फरवरी 3 -- सुख की कामना मिटती नहीं। कोई व्यक्ति सुख-दुख की सीमाओं से परे कैसे जा सकता है? सुख की इच्छा प्रत्येक प्राणी की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। संसार में ऐसा कोई जीव नहीं है, जो सुख चाहता न हो और दुख से बचना न चाहता हो। कीट-पतंगों से लेकर मनुष्य तक, सभी शांति और सुख की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहते हैं। इन सभी प्राणियों में मनुष्य सबसे अधिक विकसित और बुद्धिमान है। मनुष्य और पशु के बीच मूलभूत अंतर उनके सुख की अवधारणा में निहित है। पशुओं का सुख मुख्यतः शरीर-केंद्रित होता है। यदि उन्हें पर्याप्त भोजन मिल जाए और सोने के लिए सुरक्षित स्थान हो, तो वे संतुष्ट रहते हैं। बहुत कम पशु मानसिक शांति या जीवन के गहरे अर्थ को लेकर चिंतित होते हैं। इसके विपरीत मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है। वह जानता है कि भौतिक सुख सीमित हैं और वे स्थ...