उन्नाव, अप्रैल 2 -- उन्नाव। साहब... खतरा जानते हैं पर पेट की आग खौफ से बड़ी है। जाएं तो आखिर जाएं कहां। यह किसी एक दुकानदार की नहीं बल्कि उन सैकड़ों चेहरों की चीख है जो उन्नाव के बाजारों में मौत की ढहती दीवारों के बीच अपनी किस्मत आज़मा रहे हैं। शहर के जर्जर भवनों के नीचे चल रहा कारोबार आज उस मुकाम पर खड़ा है जहां एक तरफ कुआं है और दूसरी तरफ खाई। कोई पूछता है कि दुकान छोड़ दी तो घर कैसे चलेगा तो कोई प्रशासन की उस डरावनी खामोशी पर सवाल उठा रहा है जो शायद किसी बड़े हादसे के बाद ही टूटने वाली है। जर्जर इमारतों के खिलाफ आपके अपने अखबार 'हिन्दुस्तान' के अभियान 'मौत की इमारतें' के दूसरे दिन आज जमीनी हकीकत ने सिस्टम के दावों की धज्जियां उड़ा दीं।30 हजार राहगीरों के सिर पर लटक रही 'मौत'शहर के सबसे व्यस्ततम इलाके कचौड़ी गली, जगन्नाथगंज, स्टेशन रोड, बुध...
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