सावन में फीकी पड़ रही कजरी की तान, सिवानों और बागों से सिमट रहा लोकरंग
गंगापार, अगस्त 4 -- कौंधियारा/करछना,हिसं। सावन की रिमझिम फुहारों के साथ कभी खेत-खलिहानों और बाग-बगीचों में गूंजने वाली कजरी की मधुर तान अब धीरे-धीरे सुनाई देना बंद हो गई है। आधुनिकता की दौड़ और बदलती जीवनशैली के बीच कजरी गीत, झूले और पारंपरिक ग्रामीण खेल विलुप्त होने की कगार पर हैं।
कजरी गीतों का महत्व अपनी प्रीति-रीति, लोक परंपरा और राग-रंग को संजोए सावन के कजरी गीत अब पहले जैसी पहचान खोते जा रहे हैं। धान की रोपाई के दौरान खेतों और सिवानों में महिलाओं की सामूहिक स्वर लहरियां अब विरले ही सुनाई देती हैं। कभी ताने होइहीं छतवा... जैसे लगवही गीत और हरे रामा ऊंची अटारी... तथा रूनझुन खोला हो केवरिया... जैसी कजरियां सावन की पहचान हुआ करती थीं। महेवा गांव के हास्य कवि अशोक ''बेशरम'' बताते हैं कि मिर्जापुर की कजरी ने पूरे पूर्वांचल की चौपालों और ...
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