सावन में कजरी की मिठास हुई फीकी, लोक परंपरा को बचाने की जरूरत
सासाराम, अगस्त 5 -- डेहरी, एक संवाददाता। सावन मास की पहचान माने जाने वाले कजरी गीत अब गांवों और शहरों में पहले की तरह सुनाई नहीं दे रहे हैं। कभी सावन की रिमझिम फुहार, पेड़ों पर पड़े झूले और महिलाओं की मधुर कजरी से पूरा वातावरण गूंज उठता था, लेकिन आधुनिकता और भौतिकतावाद के दौर में यह समृद्ध लोक परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। लोक कलाकारों का कहना है कि कजरी केवल एक गीत नहीं, बल्कि सावन के उल्लास, विरह और लोक संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति है।
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