नई दिल्ली, जून 8 -- दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि सार्वजनिक जमीन पर अतिक्रमण करने वालों के लिए पुनर्वास की मांग करना संवैधानिक अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि पुनर्वास के लिए पात्रता का निर्धारण सार्वजनिक भूमि से अतिक्रमणकारियों को हटाने से अलग प्रक्रिया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि अतिक्रमणकारी तब तक सार्वजनिक भूमि पर कब्जा जारी रखने का दावा नहीं कर सकते, जब तक कि उनके पुनर्वास के दावों का समाधान नहीं हो जाता। हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी डीडीए को दक्षिण दिल्ली के कालकाजी में भूमिहीन कैंप में कानून के अनुसार तोड़फोड़ की कार्रवाई करने की इजाजत देते हुए की। जस्टिस धर्मेश शर्मा ने कहा कि रिट याचिकाएं न केवल कई पक्षों के गलत तरीके से जुड़े होने के कारण त्रुटिपूर्ण थीं, बल्कि पुनर्वास और पुनर्वास के लिए पात्र माने जाने के लिए दिल्ली स्लम और ज...
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