गिरडीह, अप्रैल 22 -- पीरटांड़, प्रतिनिधि। अपनी वास्तविक पहचान क्या है। जब व्यक्ति अपने भीतर झांकता है और अपने भावों को पढ़ता है, तब वह अपने दोषों और गुणों को समझता है, तभी साधना का मार्ग खुलता है। जब तक हम अपने आपको नहीं जानेंगे, तब तक अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान सकते। हर धर्म के क्षेत्र में पूजा, पाठ, जप, तप, व्रत आदि बहुत करते हैं, पर यदि इन सबके बीच स्वयं को ही न पहचाना तो साधना अधूरी रह जाती है। साधना की दिशा में सबसे पहले अपने आपको जानना आवश्यक है। उक्त बातें मधुबन स्थित गुणायतन में साधनारत मुनि प्रमाण सागर जी महाराज प्रवचन सभा में कही। यह भी पढ़ें- भोग नहीं आत्म ज्ञान के लिए है मानव शरीर : आचार्य सम्मेदशिखर मधुबन स्थित गुणायतन में गुणायतन प्रणेता संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज के आगमन के बाद से भक्ति की बयार बह रही है...
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