वाराणसी, अप्रैल 20 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। हिंदी कविता के लयधर्मी काव्य रूपों के गंभीर रचनाकर्म को भी हिंदी कविता परिसर में ही देखा जाना चाहिए। ये बातें वरिष्ठ नवगीतकार पं.सुरेंद्र वाजपेयी ने कहीं। वह रविवार को काशी लेखन मंच (कलम) की ओर से भदैनी स्थित साधु बेला अपार्टमेंट में आयोजित मासिक कवि गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे।उन्होंने कहा कि मुक्त छंद, गीत, नवगीत, दोहा और ग़ज़ल सब मिलकर हिंदी कविता को परिभाषित करते हैं। संस्था के कार्यकारी अध्यक्ष विनय मिश्र ने अपने ग़ज़ल गुरु मेयार सनेही को याद करते हुए कहा कि बनारस में हिंदी-उर्दू की ग़ज़ल धारा गलबहियां डाले बढ़ रही है। यह भी पढ़ें- ... लिखते हैं जख्मों को मगर महफिल समझती है हमे गजलें सुनानी है हिंदी कविता की सिकुड़ती धारा चिंता का विषय है। इस अवसर पर शायर अजफर अली के ग़ज़ल संग्रह 'प्य...