नई दिल्ली, अप्रैल 8 -- प्रभात कुमार नई दिल्ली।सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान पीठ ने बुधवार को कहा कि 'यदि कोई प्रचलित प्रथा या अंधविश्वास सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य का उल्लंघन करता है, तो उसे रद्द करने से अदालतों को नहीं रोका जा सकता, भले ही धर्म सुधार के लिए कानून बनाने की शक्ति विधायिका के पास हो।' संविधान पीठ ने यह भी कहा है कि किसी भी आवश्यक धार्मिक प्रथा को केवल संबंधित धर्म के दार्शनिक दृष्टिकोण से ही देखा जाना चाहिए। पीठ ने यह भी कहा है कि किसी धर्म में कौन सी प्रथा अंधविश्वास है, यह तय करने का अधिकार और क्षेत्राधिकार भी अदालत पास है।देश के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अगुवाई वाली 9 जजों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी तब की, जब केंद्र सरकार ने कहा कि 'कोई धर्मनिरपेक्ष अदालत इस मुद्दे पर फैसला नहीं कर सकती ...
Click here to read full article from source
इस लेख के रीप्रिंट को खरीदने या इस प्रकाशन का पूरा फ़ीड प्राप्त करने के लिए, कृपया
हमे संपर्क करें.