वाराणसी, फरवरी 28 -- वाराणसी, वरिष्ठ संवाददाता। नामवर सिंह सतत संवादधर्मी आलोचक थे। उनका मानना था कि साहित्य की सामाजिकता और साहित्य की साहित्यिकता की समझ साहित्य अध्ययन के लिए बेहद जरूरी है। ये विचार प्रो.राजकुमार ने प्रो.नामवर सिंह की जन्मशती पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन व्यक्त किए। बीएचयू के हिंदी विभाग में 'नामवर सिंह : आलोचना और वैचारिकता' विषयक त्रि-दिवसीय आयोजन किया गया है। आयोजन के दूसरे दिन शुक्रवार को 'साहित्य चिंतन से संवाद' विषयक चतुर्थ सत्र में प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि समकालीन साहित्य के पाठ विश्लेषण के क्रम में नामवर सिंह भारतीय काव्यशास्त्र को मथ डालते हैं। वे भारतीय काव्यशास्त्र की जड़ता पर प्रहार करते हैं। इससे पूर्व 'भक्ति काव्य और कबीर' विषयक प्रथम सत्र में आलोचक प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी, नेपाल...