गिरडीह, दिसम्बर 3 -- गीता ज्ञान यज्ञ के दौरान गीता में कर्म की प्रधानता बताई गई है। गीता में यज्ञार्थ कर्म करने की प्रेरणा दी गई है। यज्ञार्थ कर्म का अर्थ है कि आपके कर्म शास्त्र सम्मत हो। कर्म के साथ साथ आपकी वाणी, आपके आचार-विचार शास्त्र सम्मत हो। कहा गया कि कर्मों में अहंकार का पूर्णतः अभाव हो। मैंने किया, मैं कर्ता हूं, ऐसा भाव अहंकार को उत्पन्न करता है। गीता के अनुसार, हमें अपने कर्मों में इतना सावधान रहना चाहिए कि हमसे कभी ऐसा कर्म न हो जिससे किसी भी प्राणी को कष्ट हो। किसी भी कर्म को करने से पहले अपने कर्मों को गीता के तराजू में तौलना चाहिए। आपका कर्म राग और द्वेष से प्रेरित न होकर शास्त्र से प्रेरित हो। श्रीमद् भागवत गीता कहती है की किया हुआ कर्म लौट कर आता है। हम किसी के प्रति जैसा कर्म करते हैं ईश्वर के विधान में वह पुनः हमारे प...
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