नई दिल्ली, सितम्बर 3 -- विद्या निवास मिश्र, प्रसिद्ध साहित्यकार, संपादक हम श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाते हैं, जन्मदिन नहीं, क्योंकि श्रीकृष्ण के प्रादुर्भाव का अनुभव करना चाहते हैं। श्रीकृष्ण के जीवन चरित का स्मरण नहीं करते। जो हमारे जीवन में रचा-बसा हो, उसे स्मरण करने की क्या आवश्यकता है? हमारे कवि श्रीकृष्णलीला का गान साक्षी के रूप में करते हैं। लीला उनके सामने घटित होती रहती है। हमारी ग्रामीण जनता श्रीकृष्ण का ध्यान उत्सवों में प्रत्यक्ष उपस्थित के रूप में करती है, किसी पूर्व पुरुष या इतिहास नायक के रूप में नहीं। श्रीकृष्ण से हमारा सीधा संबंध है, उन्हें उलाहना देने का, उनसे नाराज होने का, उन्हें दुलारने का, उन्हें प्यार से बुलाने का हमें अधिकार है और इस अधिकार पर हम गर्व करते हैं। श्रीकृष्ण हमारे भाव-पुरुष हैं। उनकी लीला हमारे भाव जगत में ...