गिरडीह, मई 4 -- पीरटांड़। गुणायतन परिसर के समवसरण में गणधर पीठ पर विराजमान होकर मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने धर्म के मूल स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहा कि धर्म के मुख्यतः दो ही मार्ग हैं। श्रावक धर्म और श्रमण धर्म। व्यक्ति या तो पूर्ण त्याग का मार्ग अपनाकर श्रमण बने, अथवा गृहस्थ जीवन में रहकर श्रावक धर्म का पालन करें। आयोजित प्रवचन सभा में मुनि श्री ने श्रावक धर्म का सार बताया। कहा कि जो व्यक्ति मर्यादा, संयम और कुलाचार का पालन करता है, वह स्वभावतः दुराचार से दूर रहता है। उसके जीवन में शुद्ध आचार-विचार, सदाचार और धर्म की प्रतिष्ठा सदैव बनी रहती है। वहीं श्रमण धर्म त्याग, तप और आत्मसाधना का सर्वोच्च मार्ग है। जिसमें व्यक्ति समस्त सांसारिक बंधनों का परित्याग कर मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होता है। कहा कि दोनों ही मार्ग आत्मकल्याण के साधन हैं। एक ...