नई दिल्ली, अगस्त 6 -- संजय के भारद्वाज, प्रोफेसर, जेएनयू बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का बुधवार का संबोधन एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बयान होने के साथ-साथ अपने समर्थकों के मन को टटोलने का एक गंभीर प्रयास था। उन्होंने एलान किया कि वह दिसंबर में बांग्लादेश लौटेंगी और इसके लिए गिरफ्तारी, जेल या जान का खतरा उठाने को भी तैयार हैं। अपने पिता बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान की विरासत और 1971 के मुक्ति-संग्राम को याद करके वह भावुक भी हुईं। हालांकि, यह उनका पहला निर्वासन नहीं है। 1981, 1983, 1985 और 2007 का हवाला देते हुए उन्होंने खुद कहा कि पहले भी वह गिरफ्तारी, निर्वासन और जानलेवा हमलों का सामना कर चुकी हैं। बड़ा सवाल केवल उनकी वतन-वापसी का नहीं है। क्या शेख हसीना की वापसी बांग्लादेश में राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा को नई धार देगी या पहले से बंटी ...