औरंगाबाद, अप्रैल 25 -- अंबा, संवाद सूत्र। बदलते समय के साथ वैवाहिक रस्म-रिवाजों में व्यापक बदलाव देखने को मिल रहा है, जिससे पारंपरिक परंपराएं धीरे-धीरे हाशिए पर चली गई हैं। पहले जहां दूल्हे की पालकी सजती थी, उसकी जगह अब महंगे और लग्जरी वाहनों ने ले ली है। बारातों में मर्यादा का स्वरूप भी बदल गया है और वन डे सेरेमनी का चलन तेजी से बढ़ा है। समधी की धोती और पगड़ी जैसी परंपरागत पहचान अब कम होती जा रही है। पंगत में बैठकर भोजन कराने की परंपरा समाप्तप्राय हो चुकी है। शहनाई और ढोल-नगाड़ों की मधुर ध्वनि अब डीजे, पॉप म्यूजिक और भांगड़ा के शोर में दब गई है, जबकि अंग्रेजी बाजों का प्रचलन बढ़ा है। जयमाल की रस्म अब प्रमुख हो गई है और दुल्हन को ससुराल आने से पहले ही अधिकांश लोग देख लेते हैं, जिससे मुंह दिखाई की परंपरा औपचारिकता बनकर रह गई है। मांगलिक गी...