गंगापार, मार्च 1 -- पाठा की धरती पर गुलाबी छटा बिखेरने वाले पलास के पुष्प धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं। उनकी जगह पहाड़ी क्षेत्रों में ब्लास्टिंग और दौड़ते वाहनों की आवाज सुनाई देती है। फूलों से रंग बनाने वाले आदिवासियों की रोजी रोटी भी छिन गई है। पुष्पों के रंगों की जगह बाजार में केमिकल से बने रंग छा गए हैं। फाल्गुन मास के साथ ही क्षेत्र के आदिवासी पहाड़ों से टेसू के पुष्प जमा करना शुरू कर देते थे। बताया गया कि चंदन के बुरादे को टेसू के फूलों के साथ मिलाकर रंग बनाया जाता था।चंदन को पीस कर पानी में उबालते थे और उसी में टेसू के फूलों को मिला कर रंगीन करते थे।इसी रंग को बोतल में भर कर जमा कर लिया जाता था। होली पर उसी रंग से लोगों को सराबोर किया जाता था। इससे किसी भी प्रकार का नुक़सान नहीं पहुंचता था क्योंकि चंदन और टेसू स्वास्थ्य के लिए...