वाराणसी, अगस्त 14 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। बात सन 1944-45 की है। स्वतंत्रता संग्राम पीक पर था। भारत के बच्चे-बच्चे का जोश जाग चुका था। उस वक्त बब्बून दा अंसारी की उम्र यही कोई 13-14 साल रही होगी। शिवाला के जुबली पार्क (अब रत्नाकर पार्क) में क्रांतिकारियों की बैठक हो रही थी। किशोर बब्बून उनके लिए गुड़ और पानी लेकर पार्क में पहुंचे तो देखा अंग्रेज पुलिस उन क्रांतिकारियों को पकड़ कर पीट रही थी। यह भी पढ़ें- जब स्वतन्त्रता के भूखे शेरों ने आजादी की पहली रात झंडा फहरा लगाए नारे बब्बून दा का साहस एक क्रांतिकारी को दो सिपाही पीट रहे थे। बब्बून से यह सहन नहीं हुआ। उन्होंने पानी की बाल्टी जमीन पर रखी और गुड़ की भेलियों को चक्का की तरह फेंक-फेंक कर अंग्रेज पुलिस को मारना शुरू कर दिया। एक सिपाही ने बब्बून को पकड़ लिया तो वह भी क्रांतिकारियों की ...