लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते...बशीर बद्र का हर मंच पर छलकता रहा घर का दर्द
मेरठ, मई 28 -- 'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।' शोहरत की बुलंदियों के बीच चर्चित शायर बशीर बद्र इस दर्द को जिंदगीभर महसूस करते हुए दुनिया से रुख्सत हो गए हो गए। इस दर्द के बीज मेरठ में पड़े थे। आरोप है कि 1987 के दंगों में दंगाइयों ने उनका घर फूंक दिया। अपनी आंखों के सामने जिंदगीभर के सपने राख होते देख बशीर बद्र के दिल से शायद यही टीस शब्दों से शायरी तक पहुंची। 1974 में मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में सहायक प्रोफसर नियुक्त हुए डॉ. बशीर बद्र 1990 तक मेरठ कॉलेज से जुड़े रहे। 1987 की घटना ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया और फिर उन्होंने मेरठ छोड़ने का फैसला ले लिया। हालांकि यहां से जाने के बाद वे मुशायरों के जरिए हमेशा मेरठ से जुड़े रहे। हिन्दुस्तान के साथ उन्होंने 25 जनवरी 2010 को गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्...
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